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31 साल पहले गुम हुए बेटे को मां ने कैसे पहचाना

31 साल पहले गुम हुए बेटे को मां ने कैसे पहचाना

By SAINIK | 08 Mar 2026 | 👁 373 Views

दिल्ली से सटे गाज़ियाबाद के शहीद नगर की गली में स्थित एक घर की दूसरी मंज़िल पर लोगों के आने-जाने का सिलसिला लगातार जारी था.

यहां इकट्ठा हुई अधिकतर महिलाओं से यही सुनने को मिल रहा था.

इन्हीं औरतों से घिरी लीलावती, इन महिलाओं से बातचीत में कभी मुस्कराती तो कभी अपना सिर हिलाने लगती

जब हमने लीलावती से उनके बेटे के बारे में पूछा और कहा कि हम बीबीसी से आए हैं तो उन्होंने कहा "वो काफ़ी थक गया है, कई लोग आ रहे हैं."

लेकिन फिर कुछ देर बाद वो अपने बेटे भीम सिंह (राजू) को बुला लाईं. दोनों के चेहरे शांत थे लेकिन आंखों में नमी और थकान दिख रही थी.

कहते हैं समय के साथ-साथ चेहरे और यादें, दोनों धुंधली पड़ जाती है. लेकिन राजू से बात करने के बाद ऐसा लगा जैसे उनके मन में बचपन की यादों की तस्वीर अभी भी ताज़ा है.

वही यादें जिन्होंने वापस लौटने की उनकी उम्मीद को टूटने नहीं दिया और शायद इसीलिए वो 31 साल बाद अपने घर-परिवार के पास दोबारा लौट आए हैं.

क्या हुआ था उस दिन?

जिस दिन उन्होंने राजू को खो दिया था, उस दिन के बारे में वो कहती हैं कि उस दिन वो अनाज साफ़ करने में लगीं थीं और अपने बच्चों को स्कूल से वापस लेने नहीं गई थीं.

वो कहती हैं, "स्कूल से केवल राजू और उसकी बड़ी बहन राजो लौट रहे थे. सबसे बड़ी बहन संतोष उस दिन इनके साथ घर वापस नहीं लौटी थी."

"राजो और राजू में छतरी को लेकर झगड़ा हुआ. राजो ने कहा, 'न बारिश है, न धूप. छतरी को मत खोलो.' इस पर राजू नाराज़ हो गया और घर के गेट के बाहर बैठ गया. जब राजो ने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि कुछ लोग राजू को एक ऑटोरिक्शा में डालकर लेकर जा रहे थे."

लीलावती बताती हैं, "मेरे पास एक लड़की भागती हुई आई और कहा कि राजू को कोई ले गया. मेरे सिर पर पल्लू नहीं था, मैं ऐसे ही खुले सिर भागी. मेरी बेटी राजो सन्न खड़ी थी. मैं उसे खींचकर घर ले आई. इसे तो कुछ दिन होश ही नहीं आया कि क्या हुआ."

लीलावती बताती हैं कि उनके पति तुलाराम के दफ़्तर फ़ोन कर उन तक ख़बर पहुंचाई गई. इसके बाद साहिबाबाद थाने में राजू के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई गई

राजस्थान कैसे पहुंच गए राजू?

राजू के मुताबिक़ उन्हें ट्रक में बिठाकर राजस्थान लेकर जाया गया.

वो बताते हैं कि जहां उन्हें ले जाकर छोड़ा गया उस इलाके़ में केवल रेत ही रेत दिख रही थी.

वो कहते हैं "वहां एक झोपड़ी थी और ख़ूब सारी भेड़-बकरियां थीं. उस परिवार में चार लड़के और तीन लड़कियां थी."

वहां पहुंचने के बाद राजू से भेड़ बकरियां चराने को कहा गया.

वो बताते हैं "मुझे कई बार चाय दी जाती थी और दिन में बस एक बार रोटी और दाल मिलती थी. वो लोग मेरे पांव बांध कर रखते थे."

एक दिन की बात याद करते हुए वो बताते हैं, "एक बकरी बीमार थी और वो खड़ी नहीं हो रही थी. मैंने उसे धीरे से मारा. वो बकरी मर गई. इसके बाद मुझे बहुत पीटा गया. मेरा एक हाथ तोड़ दिया और मेरे मुंह पर इतनी ज़ोर से मारा कि मेरे दो दांत टूट गए."

गाज़ियाबाद में परिवार को ये उम्मीद थी कि उनका बेटा एक न एक दिन वापस लौटेगा.

लीलावती कहती हैं, "हमें पूरी उम्मीद थी कि हमारा बेटा आएगा, चाहे हमारे मरने के बाद आए. मेरे पति हमेशा इस बात को कहते रहते थे कि राजू लौट आएगा.

घर लौटने की कोशिश

राजू कहते हैं कि उन्होंने भी किसी तरह घर लौटने के लिए कोशिशें शुरू कर दीं.

राजू ध्यान से इस बात को देख रहे थे कि जहां वो मवेशी चराते थे वहां से ट्रक वाले मवेशी लेने आते थे. उन्होंने ट्रक ड्राइवरों से मदद की गुहार लगानी शुरु की.

राजू कहते हैं कि इस कोशिश में 31 साल बीत गए और आख़िर में एक सरदारजी ने उनकी मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया.

राजू के अनुसार, "उन अंकल ने मुझसे पूछा- तुम्हें क्यों बांधा हुआ है? मैंने उन्हें अपनी पूरी कहानी बताई और गुहार लगाई कि मुझे यहां से निकाल लें. उन अंकल ने कहा- मैं तुम्हारी मदद करूंगा."

राजू कहते हैं कि उन्होंने पीली पगड़ी पहनी थी. उन्होंने राजू से कहा कि जब वो भेड़-बकरी ट्रक में डाल रहे होंगे, उस वक्त राजू उनके ट्रक के पास पहुंच जाएं.

राजू कहते हैं, "वो मुझे दिल्ली ले आए. उन्होंने कई दिनों तक मुझे अपने पास रखा. मेरे बाल और दाढ़ी जो काफी ज़्यादा बढ़ गए थे, उन्हें काटवाया. मेरे फटे कपड़े बदलवाए और पूछा कि मेरा घर कहां था."

"मैंने उन्हें नोएडा,गाज़ियाबाद बताया. उन्होंने एक पेपर पर मेरी पूरी कहानी लिखी, मेरे हाथ में कुछ पैसे दिए और मुझे ट्रेन में बिठा दिया. मैं गाज़ियाबाद पहुंच गया."

"ट्रेन से उतर कर मैं पैदल चलता रहा. मुझे गिनती नहीं आती. मैंने चाय वाले को पैसे दिए और फिर मेरे पास कुछ नहीं बचा. मैं भूखे पेट पैदल चलता रहा और लोगों से मदद मांगता रहा. चलते-चलते मैं खोड़ा थाने पहुंचा. यहां मेरी मदद पुलिस ने की."

तीन चिह्न से पहचान की पुष्टि हुई

गाज़ियाबाद पुलिस अधीक्षक रजनीश उपाध्याय बताते हैं कि राजू को उनसे परिवार तक पहुंचाने में पुलिस ने स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया का सहारा लिया.

अख़बारों और वीडियो के ज़रिए राजू की कहानी बताई गई. इसका नतीजा ये हुआ कि कई परिवार जो अपने लोगों की तलाश कर रहे थे वो पुलिस तक पहुंचे.

लीलावती कहती हैं कि उन्हें उनकी बहन के बेटे ने कहा कि अख़बार में ऐसी ख़बर छपी है, उन्हें पहचान के लिए चलना चाहिए.

वो बताती हैं, "मैं कई बार ऐसी ख़बरों के बारे में जानने के बाद थाने गई और मायूस होकर लौटी हूं. मैं दोबारा नहीं जाना चाहती थी. लेकिन मेरी बहन के बेटे के जिद करने पर थाने चली गई".

लीलावती के अनुसार थाने में कई महिलाएं थी.

वो बताती हैं, "राजू ने मुझे देखा और ये मेरी मम्मी हैं कहते हुए कोली भर ली (गले लगा लिया). वो मुझे पकड़कर रोने लगा. पुलिस ने मुझसे पूछा- क्या आप ही इसकी मां हो. मैंने कहा- मैं तब तक नहीं मान सकती जब तक तीन निशानी नहीं देख लेती."

इसके बाद लीलावती ने राजू के शरीर पर तीन निशानियां चेक कीं - छाती पर तिल और माथे पर चोट का निशान देखा और कान में छिदे होने जैसा निशान देखा. हर बार परिवार की जो तस्वीर वो साथ लेकर जाती थीं, उन्होंने वो दिखाई.

लीलावती मुस्कराती हुई कहती हैं, "जैसे ही मैंने फ़ोटो दिखाई उसने बड़ी बहन को पहचाना, बहनों का नाम बताया और घटना वाले दिन कैसे क्या हुआ था, सारी बात बताई. उसकी याददाश्त बहुत अच्छी है. उसने ये भी बताया कि गली में एक मंदिर था और एक महिला की दुकान थी जहां से वो गोली (टॉफ़ी) लेता था."

पुलिस अधीक्षक रजनीश उपाध्याय कहते हैं, "हमने परिवार और राजू की कहानी का मिलान किया. तुलाराम ने जो 1993 में अपहरण की शिकायत दर्ज कराई थी उसकी भी जांच की. इसमें कार्रवाई हो रही है. हम कोर्ट में अर्ज़ी डाल कर इस मामले की तह तक जाने की कोशिश करेंगे

बेटे के लिए पिता का सपना

पिता तुलाराम रिटायर हो चुके हैं. अब वो घर के निचले तले पर एक आटा चक्की चलाते हैं.

वो कहते हैं, "अब यही सपना है कि वो पढ़ाई कर ले. अगर उसे अ से अनार, क से कबूतर आ जाए तो उसकी शादी कर दें. मटर को बोल रहा है ये हरे दाने क्या हैं? उसे वहां रोटी और दाल मिली, वो बस इतना ही जानता है."

"जब मैं पनीर खिलाने लगा तो बोला ये क्या है. उसमें अभी भी कमज़ोरी है. उससे हल्का-फुल्का चक्की का काम करवाउंगा. बगैर पढ़े लिखे उसकी नौकरी कहां लगेगी."

इस बीच मां लीलावती कहती हैं कि वो पिछली बाते कुरेदना नहीं चाहतीं.

वो कहती हैं, "जब राजू वहां की बातें बताता है तो मुझे बहुत दुख होता है. अगर वो हमारे साथ रहा होता वो उंचाई में बहुत लंबा होता. जिन्होंने उसके साथ ऐसा किया उनके लिए मैं क्या कहूं. मैं उन्हें नहीं जानती, राजू भी नहीं जानता. लेकिन मेरे सामने उसे कोई हाथ लगाता तो क्या मैं उसे छोड़ देती? मैं मर जाती या मार देती."

राजू कहते हैं, "राजस्थान में जहां मैं था, वहां मेरी भतीजी की उम्र की एक लड़की थी, उसने मेरी बहुत मदद की. अब मैं अपनी भतीजी से पढ़ना लिखना सीखूंगा."

राजू कहते हैं कि वो नौकरी करना चाहते हैं और पुलिसवालों ने भी उसे कहा कि वो उनकी मदद करेंगे.

हमने राजू से पूछा कि शायद उनकी कहानी उन लोगों तक भी पहुंच गई होगी जिन्होंने उनके साथ दुर्व्यवहार किया, उनके लिए वो क्या चाहेंगे.

इस पर राजू का कहना था, "ये सोचकर गुस्सा आता है कि मुझे बांधकर रखा गया, लेकिन उनको भगवान देख लेंगे."

 

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