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नोबेल शांति पुरस्कार: ‘हम पिघलकर नहीं मरना चाहते थे’, एटम बम हमले में बची महिला की आपबीती

नोबेल शांति पुरस्कार: ‘हम पिघलकर नहीं मरना चाहते थे’, एटम बम हमले में बची महिला की आपबीती

By sainik suvidha | 12 Mar 2026 | 👁 308 Views

नॉर्वे नोबेल समिति के अध्यक्ष जॉर्गन वात्ने फ्रिदनेस ने शुक्रवार को पुरस्कार की घोषणा करते हुए कहा, "दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान के हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु बम से बचे लोगों का ये ज़मीनी प्रयास सराहनीय है."

उन्होंने कहा, "समूह ने अपने अभियान के ज़रिये परमाणु हथियारों से मुक्त दुनिया हासिल करने का प्रयास किया है. उनका मकसद है कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल दोबारा कभी नहीं किया जाना चाहिए. इसके लिए निहोन हिंदानक्यो समूह को शांति पुरस्कार दिया जा रहा है."

इसी संगठन से जुड़ी हैं सेतसुको थुर्लो. इस साल की शुरुआत में उन्होंने बीबीसी से बात की थी और उस दिन की दास्तां सुनाई थी जब अमेरिकी फाइटर ने परमाणु बम गिराए थे

इस संगठन की शुरुआत बम गिराए जाने की घटना के लगभग एक दशक बाद हुई थी.

6 अगस्त 1945 को अमेरिकी लड़ाकू विमान ने हिरोशिमा शहर के ऊपर यूरेनियम बम गिराया था. इसमें एक लाख 40 हज़ार से अधिक लोग मारे गए थे.

तीन दिन बाद अमेरिका ने दूसरे शहर नागासाकी को निशाना बनाया और यहां एटम बम गिराया. इसके दो हफ़्ते बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया और इस तरह दूसरे विश्व युद्ध का भी खात्मा हो गया.

इस समूह के सह प्रमुख तोशियुकी मिमाकी ने संवाददाताओं से कहा, “मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा (नोबेल शांति पुरस्कार) होगा

हिरोशिमा का विनाश देखा

सेतसुको थर्लो हिरोशिमा के परमाणु हमले में बचने वाले खुशकिस्मतों में से एक थीं. तब वह 13 साल की थीं. इसके बाद से वो लगातार दुनियाभर में लोगों को परमाणु हथियारों के ख़तरे से आगाह करने के लिए अभियान चला रही हैं.

बम गिरते वक्त क्या हुआ था, सेतसुको ने बीबीसी को बताया, “मैंने तेज़ रोशनी देखी. मुझे ये सोचने का भी वक्त नहीं मिला कि ये क्या है क्योंकि मेरा शरीर हवा में उछल गया था और फिर मैं बेहोश हो गई.”

6 अगस्त 1945 की सुबह घड़ी में 8 बजकर 16 मिनट का समय हुआ था, अमेरिका ने ‘लिटिल बॉय’ नाम का एटम बम हिरोशिमा के ऊपर गिरा दिया. पहली बार किसी भी युद्ध में परमाणु बम का इस्तेमाल हुआ था

हर तरफ़ आग के गोले और धूल का गुबार

सेतसुको बताती हैं, “जब मुझे होश आया, तो मैंने खुद को अंधेरे से घिरा पाया, कोई शोर नहीं था.”

“मैंने अपने शरीर को हिलाने की कोशिश की, लेकिन नहीं हिला सकी. अचानक एक हाथ मेरी पीठ पर महसूस हुआ और एक मर्दाना आवाज़ कह रही थी- हिम्मत मर हारना. कोशिश करती रहो. आगे बढ़ती रहो.”

सेतसुको उस शख्स को तो नहीं देख सकीं, लेकिन अंधेरे से निकलने के उनके निर्देशों को सुनती रहीं. वो अपने स्कूली दोस्तों की चीखें सुन सकती थी. वो चिल्ला रही थीं, “भगवान बचा लो, मम्मी बचा लो.”

इमारत जलना शुरू हो गई थी. वो लोग जो वहाँ फंस गए थे- वो ज़िंदा जल गए.

वो भूत की तरह दिख रहे थे

उस कमरे में मौजूद 30 लड़कियां जापानी सेना के लिए काम कर रही थीं. उन्हें जापानी सेना में कोड ब्रेकर के लिए रखा गया था, क्योंकि वो गणित में अच्छी थीं.

सिर्फ़ सेतसुको और दो अन्य लड़कियां ही इस हमले में बच सकीं.

सेतसुको बताती हैं, “मैं देख सकती थी कि जो शरीर कुछ ही देर पहले मनुष्य थे, वो अब किसी भी तरह से मनुष्य नहीं लग रहे थे. वो मुझे भूत नज़र आ रहे थे, क्योंकि उनके बाल खड़े हो गए थे. उनकी मांस और त्वचा पिघलकर हड्डियों से झूल रही थी और शरीर के कुछ हिस्से ग़ायब थे

 

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