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बांग्लादेश, भारत के साथ रिश्तों में आई कड़वाहट को कैसे ख़त्म कर पाएगा?
By sainik | 02 Apr 2026 | 👁 56 Views
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हाल के दिनों बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की ख़बरों और सनातन जागरण मंच के प्रवक्ता चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ़्तारी के बाद भारत और बांग्लादेश के राजनयिक रिश्तों में कड़वाहट साफ दिख रही है.

 

इस मामले को लेकर बांग्लादेश और भारत, दोनों एक दूसरे के ख़िलाफ़ टिप्पणी कर चुके हैं.

दोनों जगह एक दूसरे के ख़िलाफ़ अभियान और विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिले हैं.

भारत के कोलकाता में मौजूद बांग्लादेश के डिप्टी हाई कमीशन के सामने प्रदर्शन हुए. वहीं बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों और उनके उपासना स्थलों से जुड़े लोगों को धमकी देने और वहां तोड़फोड़ किए जाने के आरोप लगे.

ताज़ा घटनाक्रम के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ प्रमुख लोगों और विश्लेषकों ने यह सवाल उठाना शुरू कर दिया है कि क्या सरकार अल्पसंख्यकों के साथ हो रही घटनाओं को आंतरिक और कूटनीतिक तौर पर ठीक तरह से संभाल पाने में सक्षम हैं.

सवाल उठाए जा रहे हैं कि हालात से निपटने के लिए मौजूदा सरकार क्या कदम उठा सकती थी या अगर सही तरीके से कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में क्या हो सकता है.

हालांकि बांग्लादेश ने संयुक्त राष्ट्र फोरम में अल्पसंख्यकों पर कहा है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर उत्पीड़न के बारे में ग़लत जानकारी फैलाई जा रही है, देश में अल्पसंख्यकों पर कोई व्यवस्थित हमला नहीं हुआ है.

संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों में बांग्लादेश के स्थायी प्रतिनिधि तारिक मोहम्मद अरिफुल इस्लाम ने अल्पसंख्यकों पर यूएन फ़ोरम के 17वें सेशन में कहा, "अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों समेत बांग्लादेश के सभी नागरिकों की सुरक्षा बांग्लादेश की अंतरिम की प्रतिबद्धता है."

शुक्रवार को भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बीते दिनों संसद में कहा था कि बांग्लादेश में मंदिरों और अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों पर भी हमले की सूचना मिली है. भारत ने इन घटनाओं को गंभीरता से लिया है. इसे लेकर बांग्लादेश सरकार से चिंता जताई गई है.

भारत के इस रुख़ पर बांग्लादेश में नाराज़गी देखी गई. बांग्लादेश सरकार के सलाहकार आसिफ़ नज़रूल ने अपने फे़सबुक पेज पर अल्पसंख्यकों पर भारत के रुख़ की निंदा करते हुए इस पर आपत्ति जताई

हालात यहां तक कैसे पहुंचे?

बांग्लादेश के हिंदू समुदाय से जुड़े एक प्रमुख व्यक्ति ने (नाम और पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर) बीबीसी बांग्ला को बताया कि बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदाय पर आज़ादी के बाद से कई बार हमले होते रहे हैं.

उन्होंने कहा, "जुलाई 2024 की शुरुआत से ही देश के अलग-अलग हिस्सों में कुछ छिटपुट घटनाएं हो रही थीं, जो अभी भी जारी हैं. हालांकि, दुर्गा पूजा के दौरान इस तरह की चिंता के बावजूद स्थिति को संभाल लिया गया था. बीते दिनों चटगांव में एक वकील की हत्या के बाद भी सरकार हालात को बिगड़ने से रोकने में कामयाब रही. यानी सरकार चाहे तो ये संभव है. लेकिन यह सभी मामलों में नहीं हो रहा है."

बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन के बाद इस साल पांच अगस्त में पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना देश छोड़कर चली गईं और उनकी सरकार का पतन हो गया. इसके बाद आठ अगस्त को अंतरिम सरकार का गठन किया गया था.

अंतरिम सरकार के गठन से पहले, इन तीन दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में अल्पसंख्यक समुदायों और उनके विभिन्न प्रतिष्ठानों पर हमले के आरोप लगे.

उस समय अंतरिम सरकार की ओर से कुछ लोगों ने यह कहने की कोशिश की कि पिछली अवामी लीग सरकार या पार्टी से जुड़े कुछ अल्पसंख्यकों पर हमला किया गया था, लेकिन अल्पसंख्यक समझकर किसी पर हमला नहीं किया गया.

हालांकि इस दौरान, हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद ने कम से कम 29 जिलों में अल्पसंख्यक समुदायों के घरों, कारोबारों और और पूजा स्थलों में तोड़फोड़ और लूटपाट की शिकायतें की.

बाद में भेदभाव विरोधी छात्र आंदोलन के बैनर तले, ढाका विश्वविद्यालय में 'अल्पसंख्यकों पर हमलों और बर्बरता' की निंदा करते हुए मानव श्रृंखला और विरोध मार्च' भी आयोजित किया गया.

मंगलवार, 13 अगस्त को अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार प्रोफे़सर मोहम्मद यूनुस ने अपने आवास पर अल्पसंख्यक समुदायों के नेताओं के साथ बैठक की.

हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद के सदस्य एडवोकेट सुब्रत चौधरी का कहना है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ हुई घटनाओं पर तत्काल कोई कदम नहीं उठाए जाने के कारण ऐसी स्थिति पैदा हुई.

उन्होंने बीबीसी बांग्ला को बताया "अभी भी थोड़ा-थोड़ा करके ये हो रहा है. शिक्षण संस्थानों में कई शिक्षकों को इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया गया है. सरकार विफल रही है. सरकार में अस्थिरता और दरार नज़र आ रही है. अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में भी अनिच्छा दिख रही है."

हालांकि देश भर में सनातन जागरण मंच की रैलियां शुरू होने के बाद हालात और जटिल हो गए हैं.

सनातन जागरण मंच और इस्कॉन

बांग्लादेश के सनातन जागरण मंच ने 25 अक्टूबर को चटगांव के लालदिघी मैदान में एक रैली आयोजित की थी. चिन्मय कृष्ण दास इसमें मुख्य वक्ता थे, जो अब देशद्रोह के मामले में जेल में हैं.

इस रैली से आठ मांगें की गईं. इनमें अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न में शामिल लोगों को दंडित करने के लिए तुरंत कार्रवाई के लिए ट्रिब्यूनल बनाने, पीड़ितों को मुआवज़ा देने और पुनर्वास और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए तत्काल क़ानून लागू करने जैसी मांगें शामिल थीं.

चिन्मय कृष्ण दास ने उस भाषण में कहा था, "अगर कोई हमें उखाड़ फेंकेगा और चाहेगा कि वो यहां शांति से रहे, तो याद रखिये ये धरती अफ़ग़ानिस्तान और सीरिया बन जाएगी."

उन्होंने कहा था, ''केवल अल्पसंख्यक पहचान के कारण 93 लोगों को पुलिस की नौकरी से हटा दिया गया. वेटरनरी और चटगांव यूनिवर्सिटी में हिंदुओं की पहचान की जा रही है. बीच में कुछ समय के लिए ऐसे काम बंद हो गए थे. लेकिन अब ये घटनाएं फिर सिर उठा रही हैं. हम अब चुप नहीं रहेंगे.''

 

लालदिघी की रैली की तस्वीरें और उनके भाषण की सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हुई. इसके बाद उन्होंने इसी मांग को लेकर रंगपुर में रैली भी की.

लेकिन इसी बीच इस्कॉन का मुद्दा चर्चा में आ गया. नवंबर के पहले सप्ताह में, चटगांव शहर के टेरीबाज़ार इलाके़ के हज़ारी में ‘इस्कॉन के बारे में फे़सबुक पोस्ट’ को लेकर पुलिस ने कम से 82 लोगों को गिरफ़्तार किया. ये इलाका हिंदू बहुल है.

इस घटना के बाद सुरक्षा बलों ने इलाके़ में बड़े पैमाने पर अभियान चलाया, जिससे यहां के हिंदू समुदाय के नेता नाराज़ हो गए.

इससे पहले इस्कॉन ने 'आमार देश पत्रिका' के संपादक महमूद उर-रहमान के ख़िलाफ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी और उनके पर 'झूठे' बयान देने के आरोप लगाए थे.

रहमान ने एक कार्यक्रम में इस्कॉन को सांप्रदायिक और भारतीय ख़ुफिया एजेंसी रॉ का संगठन बताया था.

तब इस्कॉन ने एक बयान में कहा था कि वह एक गै़र-राजनीतिक और शांतिपूर्ण धार्मिक संगठन है.

लेकिन सनातन जागरण मंच की चटगांव और रंगपुर सभा के बाद सोशल मीडिया पर यह प्रचार शुरू हो गया कि चिन्मय कृष्ण दास इस्कॉन के नेता हैं.

कुछ लोगों ने 'इस्कॉन पर प्रतिबंध' लगाने की मांग की.

हालाँकि इस्कॉन ने कहा कि चिन्मय दास और सनातन जागरण मंच से कोई लेना-देना नहीं है.

इस बीच, पुलिस ने सोमवार को चिन्मय कृष्ण दास को ढाका से गिरफ्तार कर लिया. अगले दिन उन्हें देशद्रोह के मामले में अदालत में पेश किया गया. उनके बहुत से अनुयायी भी वहां एकत्रित हो गए.

इस दौरान वहां झड़प शुरू हो गई. झड़प के दौरान अदालत के मुख्य द्वार के सामने वाली गली में वकील सैफु़ल इस्लाम की मौत हो गई.

इस घटना पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की. बांग्लादेश ने भी जवाबी प्रतिक्रिया दी.

बांग्लादेश-भारत के रिश्ते कितने प्रभावित होंगे?

चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के बाद भारत में हिंदू संगठनों ने आक्रामक प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी. बांग्लादेश में भी इस्कॉन और भारत विरोधी अभियान भी शुरू हो गया.

भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से भी बयान आया. मंत्रालय ने कहा, ''जहां अल्पसंख्यकों पर हमलों के अपराधी पकड़ से बाहर हैं, वहीं एक धार्मिक नेता को इन अन्यायों के ख़िलाफ़ बोलने पर गिरफ़्तार कर लिया गया है.'’

बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारत के बयान के बाद चिंता व्यक्त करते हुए एक जवाबी बयान में कहा, ''कुछ ख़ास आरोपों के आधार पर चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ़्तारी के बाद से कई हलकों से उनके बारे में भ्रामक जानकारी फैाई जा रही है. इस तरह का बेबुनियाद बयान न केवल ग़लत हैं, बल्कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों और समझ की भावना के भी ख़िलाफ़ है.''

इसके बाद गुरुवार को बांग्लादेश सरकार ने एक बयान जारी कर कोलकाता में बांग्लादेश के उप उच्चायोग के सामने बांग्लादेश का राष्ट्रीय ध्वज और मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस का पुतला जलाने की कड़ी निंदा की.

शुक्रवार को भारतीय विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक ब्रीफिंग में बांग्लादेश का मुद्दा भी उठा.

मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने कहा, ''हमारी स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है. बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को सभी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी चाहिए.”

बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के कुछ सलाहकारों ने भारत का ज़िक्र करते हुए कई तरह की टिप्पणियां की हैं.

बांग्लादेश सरकार में सलाहकार आसिफ़ नज़रूल ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा, ''बांग्लादेश की स्थिति के बारे में भारत की अनुचित चिंता बंद नहीं हुई है. भारत की ही धरती पर अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के लोगों पर अत्याचार की अनगिनत घटनाएं होती रहती हैं. लेकिन उन्हें इस बात पर कोई शर्म या अफ़सोस नहीं है. भारत का यह दोहरापन निंदनीय और अपमानजनक है.''

बांग्लादेश के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सलाहकार नाहिद इस्लाम ने चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी पर भारत के बयान के बारे में कहा, ''वो इस घटना को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं.''

क्या बांग्लादेश सरकार हालात को संभाल लेगी?

ढाका की एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी में बांग्लादेश-भारत संबंधों पर एक सेमिनार में बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के सलाहकार ने शनिवार को कहा कि अगर भारत ने बांग्लादेश की चिंताओं को महत्व दिया होता तो ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती.

उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया की भूमिका भी दोनों देशों के बीच सामान्य रिश्ते स्थापित करने में मददगार नहीं रही है.

वहीं राजनीतिक विश्लेषक और ढाका यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले सब्बीर अहमद का कहना है कि सरकार अल्पसंख्यकों से बातचीत कर उनकी बात सुन सकती थी और समस्या के समाधान के लिए पहल कर सकती थी.

उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, ''अगर इस्कॉन मुद्दे को ठीक तरह से नहीं सुलझाया गया तो ये मुश्किल पैदा कर सकता है. अगर कोई संगठन धार्मिक है तो कोई दिक्कत नहीं है लेकिन अगर धार्मिक संगठन राजनीतिक भूमिका निभाता है, तो इससे संदेह पैदा हो सकता है.''

उन्होंने कहा कि भारत की बीजेपी एक हिंदुत्व वादी पार्टी है और इसीलिए वो इस मुद्दे पर बार-बार बोलेगी.

उन्होंने कहा ''यह देखना होगा कि इसकी वजह से भारत के साथ बांग्लादेश के रिश्ते खराब न हों. अगर ऐसा हुआ तो बांग्लादेश को ज़्यादा नुक़सान होगा. इसलिए हमारी ओर से पहल और पारदर्शिता में कोई कमी नहीं होनी चाहिए."

ढाका यूनिवर्सिटी के क़ानून के शिक्षक हफ़ीज़ुर्रहमान कर्ज़न का कहना है कि सरकार की कमी के कारण अल्पसंख्यकों के मंदिरों और घरों पर कुछ हमले हुए हैं.

उन्होंने कहा '' कुछ समूह बांग्लादेश और भारत में गै़र-ज़िम्मेदाराना तरीके़ से सांप्रदायिकता फैला रहे हैं. इसी कारण ये घटना इतनी आगे बढ़ गई. सरकार पहले भी राजनीतिक दलों से बातचीत कर सकती थी. लेकिन सरकार की ओर से जितनी ज़िम्मेदारी से बयान दिया जाना चाहिए था, वो नहीं हुआ.''

हफ़ीज़ुर्रहमान कर्ज़न के मुताबिक़ अगर बांग्लादेश में सांप्रदायिक सद्भाव नहीं होगा, तो यहां अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है.

 

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